बाल विवाह विरोध अधिनियम - 1929
आजादी पूर्व से ही हमारे देश मे बाल विवाह कि प्रथा रही हैँ । इस प्रथम के विरूद्ध समय - समय पर समाज सुधारको ने आवाज भी उठाई । ब्रिटिश शासन ने भी महसूस किया था कि बाल विवाह भारतवर्ष मे एक सामाजिक अपराध हैँ , और इसके विरूद्ध अधिनियम लाए जाने कि आवशयकता हैँ । यह ब्रिटिश कालीन अधिनियम हैँ ,
इसके अंतग्रत किए गए विशेष प्रावधान नियम प्रकार हैँ :-
इस अधिनियम के अनुसार लड़के कि आयु 21 वर्ष और लड़की कि आयु 18 वर्ष जानी चाहिए । यदि इससे कम आयु मे विवाह किया जाता हैँ , तो इसे दण्डनीय अपराध माना गया हैँ । यहा तक कि इस प्रकार की शादी मे शिरकत करने वाले व्यक्ति को भी तीन माह के कारावास और जुर्माना की सजा से दंडित किया जा सकता हैँ ।
यदि कोई लड़का बाल विवाह करता हैँ जिसकी स्वयं की उम्र 18 वर्ष से ज्जादा लेकिन 21 वर्ष से कम हैँ तो उसे 15 दिन का कारावास और जुर्माना की सजा हो सकती हैँ । इसी प्रकार यदि कोई पुरुष 21 वर्ष से अधिक उम्र का हैँ और वह 18 वर्ष से कम आयु की लड़की से शादी करता हैँ तो उसे तीन वर्ष की जेल एव जुर्माना की सजा दी जा सकती हैँ । हमारे देश मे जिला स्तर पर कलेक्टर को बाल विवाह रोकने के लिए इस अधिनियम के तहत अधिकार दिए गए हैँ । अवशयकता पड़ने पर प्रथम श्रेणी न्यायाधीश इस अधिनियम की शक्तियों का उपयोग करते हुए बाल विवाह रोकने के लिए स्टे जारी कर सकता हैँ । लेकिन इस अधिनियम के अनुसार बाल विवाह कानून का उल्लधन करने के लिए लड़की को सजा प्रदान नहीं की जा सकती ।
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