Tuesday, 29 July 2014

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955

                                                        हिन्दू विवाह अधिनियम 1955  

हिंदुओ के बीच विवाह संबधी कानून को संशोधित और सहिताबद्ध करने हेतु जिस अधिनियम की स्थापनाकी गई, वही हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के नाम से जाना जाता हैँ / विवाह सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण आधार हैँ । विवाह के  द्रारा जहा दो परिवारों के बीच नए संबंध विकसित होते हैँ , वही समय-समय पर उन संबधों मे परेशानिया भी पैदा होती हैँ । उन परेशानियो, बध्यताओ और दायित्वो को जो विवाह के पशचात पक्षकारो मे उत्पन्न होते हैँ , उनका विधिवत समाधान करने के उदेश्य से अधिनियम की  आवशयकता थी । यह स्पष्ट हैँ  की हिंदू विवाह अधिनियम के कुछ प्रावधान निशिचत और घोषणात्त्मक हैँ , जो धारा -5 के अनुसार हिंदू विवाह की शर्तो को कानून के दायरे मे लाते हैँ  । हिंदू विवाह अधिनियम की विशेषताओ का वर्णन अग्रलिखित हैँ :-
धारा -2 के अनुसार यह अधिनियम निम्म को हिंदू विवाह एक्ट 1955 के अन्तर्गत परिभाषित करता हैँ -
(क) वह व्यक्ति जो वीरशैव, लिगायत, ब्रांहा, प्रार्थना या आर्य समाज अनुयायियों सहित हिंदू धर्म के रूपो  या विकसो के नाते धर्म से हिंदू के रूप मे मान्य हैँ  ।
(ख) जो धार्मिक रूप से बौद्ध , जैन या सिक्ख हैँ  ।
(ग) राज्यो के वे निवासी जो धर्म के मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैँ ।

                                                    धर्म से हिंदू,बौद्ध, जैन या सिक्ख की स्थिति


(क) ऐसा बालक जिसके माता या पिता मे से कोई एक धर्म से हिंदू , बौद्ध, जैन या सिक्ख हो तो बालक हिंदू होगा ।
(ख) माता पिता मे से एक उपरोक्त (क) क्षेणी का हो और बालक का लालन पालन हिंदू,  बौद्ध, जैन या सिक्ख धर्म अनुसार किया गया हो ।
(ग) ऐसा व्यक्ति भी हिंदू हैँ  जिसने हिंदू , बौद्ध, जैन या सिक्ख धर्म को ग्रहण किया हैँ  या एक बार छोड़ने के पश्चात पुन ग्रहण किया हैँ ।
इसके अतिरिक्त केंन्द्रीय सरकार राजकीय गज़ट मे जिस आदिम जाति के सदस्यो को हिंदू निदिष्ट करे । जो व्यक्ति इस अधिनियम के उपबंधो के अधीन हिंदू माना गया हैँ , चाहे धर्म से वह हिंदू न हो ।


                                                 विवाह पंजीकरण अनिवार्य


जरूरत क्यो: यदि आप पति सहित विदेश जाना चाहते हैँ  तो आपको विवाह का प्रमाण पत्र देना होगा । बिना विवाह प्रमाण पत्र के आप पत्नी को विदेश मे नहीं ले जा सकते । प्रेम विवाह और सामान्य विवाह का भी पंजीकरण करवाया जा सकता हैँ  ।
कैसे होगा पजीकरण : विवाह पंजीकरण के लिए पति - पत्नी का वयस्क होना जरूरी हैँ  । विवाह करने के बाद काम एक माह से दोनों मे से एक पक्ष सबंधित ज़िले मे निवास कर रहा हो ।पाँच प्रतियो मे भरे हुआ आवेदन फॉर्म के साथ 10 रुपये के नॉन ज्युडीशियल स्टाम्प पेपर पर पति - पत्नी के अलग - अलग शपथ पत्र, विवाह के फोटो, शादी के कार्ड, आयु प्रमाण पत्र और निवास का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा ।
संपर्क कहा करे:  इसके लिए कलेक्टर कार्यालय मे संपर्क करना होता हैँ  । अतिरिक्त ज़िला कलेक्टर (सिटी) के कार्यालय मे संपर्क किया जा सकता हैँ । विवाह पंजीकरण का फॉर्म भी वही मिल जाता हैँ  । कुछ लोग सुविधा के लिए वकीलो की मदद ले सकते हैँ । वैसे वकीलो की जरूरत नहीं हैँ  ।
कब मिलेगा प्रमाण पत्र :  आवेदन करने के 30 दिन बाद सामान्यत विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाता हैँ  । प्रमाण पत्र ल समय तीन गवाहो का होना जरूरी हैँ  । इसमे एक - एक व्यक्ति वर - वधू पक्ष का और तीसरा विवाह वाला पंडित हो तो बेहतर रहता हैँ  ।

                                          शादी रजिस्ट्रेशन व उसके लाभ 
                             
एक समय था , जब शादियो का रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं माना जाता था, लेकिन अब बदलते सामाजिक परिवेश मे यह जरूरी हो गया हैँ , क्योकि कई बार शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं होने से महिला अपने अधिकारो से वंचित रह जाती हैँ  ।
                                            कैसे होता हैँ  रजिस्ट्रेशन


शादी का रजिस्ट्रेशन दो तरह से होता हैँ  - पहला स्पेशल  मैरिज एक्ट , जिसके तहट प्रेम विवाह , अंतरजातीय विवाह तथा किसी भी वर्ग से जुड़े लोग शादी का रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैँ  । इसमे  सभी के लिए एक जैसे ही नियम होते हैँ  । दूसरे एक्ट के अंतर्गत हिन्दू, मुस्लिम, तथा ईसाई धर्म के लोगआते हैँ  ।
- हिन्दू मेरिज एक्ट के तहत अगर कोई अपनी शादी का रजिस्ट्रेशन करवाता हैँ  , तो रजिस्ट्रार तहकीकात का शादी रैजिस्टर्ड करता हैँ  ।
- स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत लड़का -लड़की को एक फार्म भरना पडता हैँ , जिसमे लड़के एव लड़की के माता - पिता तथा जिस पंडित ने शादी करवाई हैँ   , हस्ताक्षर होना जरूरी होता हैँ , साथ ही दोनों पक्ष के गवाहो के  हस्ताक्षर  भी अनिवार्य हैँ  । इसके अलावा फार्म के कॉलम मे लिखी गई निम्न शर्त पूरी होना चाहिए, जैसे - 
- पंजीकरण करने की सूचना ।
- लड़का - लड़की दोनों के अलग - अलग शपथ पत्र ।
कितना समय लगता हैँ  - अगर शादी हो गई, तो एक हफ्ते का समय लगता हैँ । यदि नई मैरिज रैजिस्टर्ड कराना हैँ , तो फार्म जमा करने के 30 दिन बाद प्रमाण पत्र मिलता हैँ  ।
फीस - ज़्यादातर महिलाओ का सोचना होता हैँ  कि मैरिज कि रजिस्ट्री करवाने मे काफी पैसे लगते हैँ , लेकिन ऐसा नहीं हैँ । आपको इसमे सिर्फ 100 रुपये खर्च करने पड़ेगे । इसके प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए दस रुपये का चालान, दस रुपये का पति का एफ़िडेविट, दस रुपये का पत्नी का एफ़िडेविट तथा 15-20 रुपये का नोटरी फीस लगती हैँ  । अगर आप नोटरी से रैजिस्टर्ड नहीं करवाना चाहती हे, तो तहसीलदार या ज्यूड़ीशियल ऑफिसर भी कर सकता हैँ । रजिस्ट्रेशन के लिए किसी वकील कि जरूरत नहीं पड़ती ।

                                                
                                                कार्यालय तथा अधिकारी


ज़िले का कलेक्टर मैरिज ऑफिसर होता हैँ  । लेकिन अगर कलेक्टर चाहे, तो किसी ए डी एम को यह जिम्मा सौप सकता हैँ  । शादी का रजिस्ट्रेशन कलेक्टर ऑफिस मे होता हैँ  ।
रजिस्ट्रेशन का महत्व
शादी का रजिस्ट्रेशन वैधानिक सबूत हैँ  । पासपोर्ट जैसे सरकारी दस्तावेजो के लिए इसका होना बहुत जरूरी हैँ  इसके अलावा अगर कोई महिला अपने पति के विरुद्ध भरण - पोषण का दावा करती हैँ  , लेकिन पति उसे पत्नी मानने से इन्कार कर देता हैँ  । उस स्थिति मे रजिस्ट्रेशन महिला के लिए एक आसान सबूत होगा ।
दूसरी उपयोगिता यह हैँ  कि हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार अगर महिला पिता कि संपाति मे हिस्सा चाहती हैँ  , लेकिन पिता महिला को अपनी पुत्री मानने से इनकार कर देता हैँ , उस स्थिति मे महिला  शादी प्रमाण -  पत्र मे पिता के हस्ताक्षर को सबूत के रूप मे पेश कर सकती हैँ  तथा अपना अधिकार हासिल कर सकती हैँ  ।
लेकिन अगर अपनी शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं करवाया हैँ  तो इन विकट परिस्थितियो मे आप किसकी पत्नी हैँ  तथा किसकी बेटी हैँ , यह साबित करना मुश्किल हो जाता हैँ , क्योकि शादी के अगर कई वर्ष बीत गए हो , तो गवाह पेश करना भी मुश्किल हो जाता हैँ  ।


       
                                                               
             

      
 

बाल विवाह विरोध अधिनियम - 1929

                                          बाल विवाह विरोध अधिनियम - 1929 
आजादी पूर्व से ही हमारे देश मे बाल विवाह कि प्रथा रही हैँ । इस प्रथम के विरूद्ध समय - समय पर समाज सुधारको ने आवाज भी उठाई । ब्रिटिश शासन ने भी महसूस किया था कि बाल विवाह भारतवर्ष मे एक सामाजिक अपराध हैँ , और इसके विरूद्ध अधिनियम लाए जाने कि आवशयकता हैँ । यह ब्रिटिश कालीन अधिनियम हैँ ,
इसके अंतग्रत किए गए विशेष प्रावधान नियम प्रकार हैँ :-
इस अधिनियम के अनुसार लड़के कि आयु 21 वर्ष और लड़की कि आयु 18 वर्ष जानी चाहिए । यदि इससे कम आयु मे विवाह किया जाता हैँ , तो इसे दण्डनीय अपराध माना गया हैँ । यहा तक कि इस प्रकार की शादी मे शिरकत करने वाले व्यक्ति को भी तीन माह के कारावास और जुर्माना की सजा से दंडित किया जा सकता हैँ ।
यदि कोई लड़का बाल विवाह करता हैँ  जिसकी स्वयं की उम्र 18 वर्ष से ज्जादा लेकिन 21 वर्ष से कम हैँ  तो उसे 15 दिन का कारावास और जुर्माना की सजा हो सकती हैँ । इसी प्रकार यदि कोई पुरुष 21 वर्ष से अधिक उम्र का हैँ  और वह 18 वर्ष से कम आयु की लड़की से शादी करता हैँ  तो उसे तीन वर्ष की जेल एव जुर्माना की सजा दी जा सकती हैँ । हमारे देश मे जिला स्तर पर कलेक्टर को बाल विवाह रोकने के लिए इस अधिनियम के तहत अधिकार दिए गए हैँ । अवशयकता पड़ने पर प्रथम श्रेणी न्यायाधीश इस अधिनियम की शक्तियों का उपयोग करते हुए बाल विवाह रोकने के लिए स्टे जारी कर सकता हैँ । लेकिन इस अधिनियम के अनुसार बाल विवाह कानून का उल्लधन करने के लिए लड़की को सजा प्रदान नहीं की जा सकती ।

विवाह संबंधी अपराध

                                                               विवाह संबंधी अपराध

धारा 493: यदि पुरुष द्रारा उस स्त्री को , जो उससे कानून के अनुसार विवाहित नहीं हैँ , उसे छल कपट  द्रारा  यह विश्वास कराकर कि वह उससे विवाहित हैँ , उस विश्वास के साथ उससे सहवास करना दस वर्ष के कारावास और जुर्माना से दण्डनीय अपराध हैँ । इस असज्ञेय एव अजमानतीय मामले का विचरण प्रथम वर्ग मैजिस्ट्रेट द्रारा  किया जाता हैँ
धारा 494: यदि कोई पति या पत्नी के जीवन काल मे अर्थात  उनके जीवित रहते दूसरा विवाह कर लेता हैँ ,तो इस अपराध के लिए सात वर्ष के कारावास और जुर्माना के दण्ड का प्रावधान हैँ  ।  इस असज्ञेय एव जमानतीय मामले का विचरण प्रथम वर्ग मैजिस्ट्रेट कर सकता  हैँ ।
धारा 495 : यदि कोई व्यक्ति अपने पिछले विवाह को उस व्यक्ति से छिपाकर रखता  हैँ , जिसके साथ उसने बाद मे विवाह किया  हैँ , तो इस अपराध के लिए दस वर्ष के कारावास और जुर्माना का प्रावधान  हैँ । इस असज्ञेय एव जमानतीय मामले का विचारण प्रथम वर्ग मैजिस्ट्रेट कर सकता  हैँ ।
धारा 496: कपट करने के उदेश्य से विवाहित होने के कर्म को यह जानते हुए किसी व्यक्ति द्रारा पूरा किया जाना कि ऐसा लगे वह विधिपूर्वक विवाहित नहीं हुआ हैँ  अर्थात विवाहित होते हुआ अविवाहित होने का प्रदर्शन करना ऐसा अपराध हैँ , जिसके लिए साथ वर्ष के कारावास और जुर्माना के दण्ड का प्रावधान हैँ । इस असज्ञेय एव जमानतीय मामले का विचारण प्रथम वर्ग मैजिस्ट्रेट कर सकता हैँ ।
धारा 497: जारकर्म । यदि किसी विवाहित स्त्री के साथ उसकी बिना सहमति से सहवास  किया जाए और सहवास करने वाला व्यक्ति उसका पति न हो , तो वह अपराध पाच वर्ष के कारावास या जुर्माना या दोनों से दण्डनीय हैँ । इस असज्ञेय एव जमानतीय मामले का विचारण प्रथम वर्ग मैजिस्ट्रेट कर सकता हैँ ।
धारा 498 : विवाहित स्त्री को अपराध करने के उदेश्य से बहलाकर  ले जाना और उसे विधि विरूद्ध अपने पास बनाए रखने का अपराध दो वर्ष के कारावास या जुर्माना अथवा दोनों से दण्डनीय हैँ । इस असज्ञेय एव जमानतीय मामले का विचारण प्रथम वर्ग मैजिस्ट्रेट कर सकता हैँ ।

Sunday, 13 July 2014

गिरफ्तारी कैसे की जाएगी

गिरफ्तारी करने वाला शख्स , गिरफतार किए जाने वाले व्यक्ति के शरीर को स्पर्श या पकड द्रारा  मजबूर कर सकता हैँ , ताकि गिरफ्तारी संभव हो सके वचन ओर कर्म के अनुसार जब तक यह विशवास हो पाए कि  अपराधी ने स्वय को गिरफ्तारी मे समर्पित कर दिया हैँ  
   गिरफ्तारी का विरोध करने वाले व्यक्ति को गिरफतार करने के लिए उन तमाम साधनो का उपयोग किया जा सकता  हैँ , जो उसकी गिरफ्तारी के लिए कानूनी रूप से संभव हो
गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति पर म्रातुदण्ड या आजीवन कारावास का अभियोग हो तो उसकी गिरफ्तारी के लिए उसे म्रत्यु दिए जाने का अधिकार नहीं हैँ  
असाधारण परिस्थितियो मे ही स्त्री कि गिरफ्तारी सूर्यादय के पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात कि जा सकती हैँ  
महिला पुलिस अधिकारी इस प्रकार कि असाधारण गिरफतारी लिखित रिपोर्ट करके एव न्यायिक मैजिस्ट्रेट कि अनुज्ञा से होगी
गिरफतारी वारंट से युक्त अधिक्रत पुलिस अधिकारी को उस निवास का स्वामी सभी सुविधाए देगा, जिस स्थान या निवास मे अपराधी के छिपा होने का शक हैँ  
अपराधी यदि ऐसे स्थान पर छिप जाता हैँ  जहा कानून प्रवेश वर्जित हैँ   वह स्थान या निवास अपराधी या अन्य व्यक्ति का होसकता हैँ   गिरफ्तारी वारंट से युक्त पुलिस अधिकारी ( अपराधी के अपराध के लिए गिरफ्तारी वारंट दिया जा सकता हो तब भी ) को लगता हैँ  कि वारंट  हासिल करने तक अपराधी वहा से फरार हो सकता हैँ  तो पुलिस अधिकारी अपने अधिकार और प्रयोजन कि सूचना देकर वहा प्रवेश कर सकता हैँ  

चेक बाउसिंग भी हैँ अपराध क्या हैँ यह कानून ?

1.        किसी व्यक्ति द्रारा जारी किया गया चेक अगर बाउन्स हो जाता हैँ  , तो आप कोर्ट की शरण मे जा सकते हैँ  , लेकिन इसके लिए दो बातों का ध्यान रखना  पडेगा
2.         चेक की  वेधता 6 महीने तक होती हैँ   इस दौरान आप बैंक मे कभी भी चेक जमा कर सकते हैँ   अगर इस अवधि मे आपका चेक बाउस हो जाता हैँ   तो छह महीने खत्म  होने के बाद अगले तीस दिन के अंदर आपको कानूनी नोटिस भेजना होगा अगर आप एक दिन भी देर करते हैँ  , तो चेक बाउस का मामला नहीं बन सकता
3.         चेक गिफ्ट के रूप मे जारी नहीं किया गया हो

अदालत की प्रकिया
अगर कानूनी नोटिस भेजने के 15 दिन के अंदर वह व्यक्ति रकम नहीं चुकता हैँ  , तो एक महीने के अंदर चीफ़ जुड़ीशियल मैजिस्ट्रेटके यहा 138 नेगोशिएबरल  स्टेमेंट के तहत एक शिकायत दर्ज करनी होगी शुरुआती गवाहीके बाद उस व्यक्ति के नाम  सम्मन जारी होगा और क्रिमिनल प्रोसीजर के तहत केस चलेगा अगरउस व्यक्तिकी गलतीपायी जाती हैँ  , तो उस अधिकतम तीन साल की सजा और जुर्माना हो सकता हैँ  

आरोपी के हक
 1.        छह महीने का समय बीज जाने के बाद केस करने के लिए 30 दिन का समय होता  हैँ   अगर एक दिन भी ज्यादा हो गया तो आरोपी पर केस नहीं  चल सकेगा
2.         लीगल नोटिस मिलने के 15 दिन के अंदर चेक जारी करने वाले व्यक्ति ने पैसे लौटा दिये तो ऐसे स्थिति मे भी उसके खिलाफ चेक बाउन्स का केस नहीं चलेगा